मैं लेट नहीं, समय से स्वतंत्र हूँ
— एक कालगत अल्पसंख्यक की आत्मकथा
सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि मैं लेट नहीं होता।
मैं बस समय के साथ वैकल्पिक संबंध में विश्वास करता हूँ।
इसे आप चाहें तो Temporal Independence कह सकते हैं।
समाज ने समय को नैतिकता बना दिया है। जो समय पर पहुँचे, वही चरित्रवान। जो पाँच मिनट लेट हो, वह संदिग्ध।
यह वही समाज है जहाँ ट्रेन “लेट है” कहा जाता है, “गलत” नहीं। जहाँ फाइल “प्रोसेस में है” वर्षों तक। लेकिन व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह स्विस घड़ी हो।
मैं जब कहता हूँ, “बस आ रहा हूँ”, तो मैं झूठ नहीं बोलता।
मैं बस मानव समय में बोल रहा होता हूँ, न कि कैलेंडर और अलार्म वाले कॉर्पोरेट टाइम में।
आइंस्टाइन ने कहा था — Time is relative.
मुझे नहीं पता लोग इसे पढ़ते क्यों हैं, मानते क्यों नहीं।
मेरे लिए समय एक सीधी रेखा नहीं, एक नदी है।
कभी तेज़ बहती है, कभी ठहर जाती है।
और कभी—जब मैं चाभी ढूँढ रहा होता हूँ—सूख जाती है।
औद्योगिक युग से पहले लोग सूरज, भूख और नींद से समय पहचानते थे। फिर घड़ी आई, और उसके साथ आया discipline।
समाजशास्त्री इसे “समय का अनुशासन” कहते हैं।
मैं इसे कहता हूँ—अनावश्यक जल्दबाज़ी।
लेट होना आलस्य नहीं है।
यह इस बात की स्वीकृति है कि जीवन PowerPoint स्लाइड्स में नहीं चलता।
हर मीटिंग समय पर शुरू हो जाए, तो दुनिया से आधी छोटी-छोटी मानवीय कहानियाँ गायब हो जाएँ।
और सच पूछिए तो लेट होना एक सेवा है।
यह मीटिंग को छोटा करता है।
यह इंतज़ार करना सिखाता है।
यह punctual लोगों को humility देता है।
मैं मानता हूँ, मैंने ट्रेनें छोड़ी हैं।
कुछ मौके भी।
शायद एक-दो प्रमोशन भी।
लेकिन बदले में मैंने समय से बाहर रहना सीखा है—जहाँ हर मिनट productive नहीं, कुछ simply alive होते हैं।
भविष्य में मेरी माँग है कि समाज हमें स्वीकार करे।
एयरपोर्ट पर Latecomers Lounge हो।
ऑफिस में “Flexible Time Realities” हों।
डॉक्टर कहें — “आपको Chronic Chrono-Difference है, alarm नहीं, आराम चाहिए।”
क्यों हर दिल की धड़कन को atomic clock से sync करना ज़रूरी है?
क्यों मेरे पाँच मिनट, आपके पाँच मिनट जैसे ही हों?
जब ब्रह्मांड Big Bang से शुरू हुआ था, वह भी बिल्कुल on time नहीं था।
तो मैं क्यों होऊँ?
इसलिए अगली बार जब मैं लेट आऊँ, नाराज़ मत होइए।
आप एक दुर्लभ चीज़ देख रहे हैं—मानव समय की विविधता।
और अब मुझे चलना चाहिए।
एक मीटिंग है, जिसमें मुझे दस मिनट पहले पहुँचना था।
लेकिन घबराइए मत—
मैं अपने समय पर लेट हूँ।
लेखक
शिरीष मोहन खरे











