SIR विवाद से थरराया लोकतंत्र: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर उठे सवाल, सड़क से संसद तक संग्राम
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और मुख्य संवैधानिक संस्थाओं में से एक—भारत निर्वाचन आयोग (ECI)—इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर उठा विवाद अब केवल वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया में आए हालिया खुलासों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अत्यधिक गरमा गया है। दो अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों, फॉर्म 6 (Form 6) में किए गए अनधिकृत बदलावों और मतदाता डेटा के केंद्रीयकरण के आरोपों ने विपक्षी दलों को एकजुट कर दिया है। आइए समझते हैं कि आखिर ‘SIR विवाद’ क्या है, इसमें ज्ञानेश कुमार की क्या भूमिका है और इस पर देश में क्या वर्तमान स्थिति बनी हुई है।
क्या है SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) विवाद?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों (Electoral Rolls) के सत्यापन, नए मतदाताओं को जोड़ने और फर्जी या डुप्लिकेट नामों को हटाने के लिए चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि केवल पात्र नागरिक ही वोट डाल सकें।
हालाँकि, हाल ही में खोजी पत्रकारिता (The Indian Express की रिपोर्ट) के माध्यम से यह बात सामने आई कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर भारी मतभेद चल रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, तीन सदस्यीय आयोग में शामिल दो अन्य चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी—ने SIR प्रक्रिया और निर्णय लेने के तरीकों पर 14 बार लिखित रूप से औपचारिक आपत्तियां (Formal Objections) दर्ज कराई थीं।
विवाद के तीन मुख्य केंद्र बिंदु:
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फॉर्म 6 में बिना कानूनी अधिसूचना बदलाव: मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म 6 के पोर्टल पर एक नया प्रश्न जोड़ा गया, जिसमें नए आवेदकों से पूछा गया कि क्या उनका या उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR प्रक्रिया की वोटर लिस्ट में शामिल था। चुनाव आयुक्त संधु ने इसे “गैर-कानूनी और अनधिकृत” करार दिया।
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डेटाबेस का केंद्रीयकरण (Centralisation of Data): आयोग के ECINet पोर्टल और सॉफ्टवेयर के जरिए मतदाता डेटा का केंद्रीयकरण किया गया। आरोप है कि इससे निचले स्तर के संवैधानिक अधिकारियों (जैसे Electoral Registration Officers – EROs) के अधिकारों में कटौती हुई और दिल्ली स्थित सिस्टम द्वारा सीधे बदलाव संभव बनाए गए।
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सामूहिक फैसले का अभाव: 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। आरोप लगाए गए हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा कई महत्वपूर्ण फैसले अन्य दोनों आयुक्तों को जानकारी दिए बिना “एकतरफा” लिए गए।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और उठे सवाल
1988 बैच के आईएएस अधिकारी रहे ज्ञानेश कुमार को फरवरी 2025 में भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इससे पहले वे गृह मंत्रालय में धारा 370 के निरस्त्रीकरण और राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
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SIR विवाद के केंद्र में ज्ञानेश कुमार की प्रशासनिक शैली और उनके द्वारा लिए गए एकतरफा फैसले हैं।
| आरोप व मुख्य बिंदु | स्थिति और विवरण |
| एकतरफा फैसले लेने का आरोप | वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों (जैसे कपिल सिब्बल) का आरोप है कि आयोग की बैठकों का कोई पूर्व एजेंडा जारी नहीं किया गया और बिना मिनट्स रिकॉर्ड किए निर्णय थोपे गए। |
| दोनों चुनाव आयुक्तों का दरकिनार होना | चुनाव आयुक्त संधु और विवेक जोशी द्वारा दर्ज 14 आपत्तियों के बावजूद निर्णय प्रक्रिया जारी रखी गई। |
| IT विभाग पर नियंत्रण | कार्य आवंटन में बदलाव करके आईटी विभाग की देखरेख को लेकर मतभेद उभरे, जिसे लेकर कैबिनेट सचिव तक पत्र लिखा गया। |
चुनाव आयोग का पक्ष:
निर्वाचन आयोग ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में विचार-विमर्श और सुझावों का आदान-प्रदान आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है। आयोग के अनुसार, SIR से जुड़े सभी अंतिम फैसले संवैधानिक ढांचे के भीतर और आयोग की सामूहिक स्वीकृति से ही लागू किए गए थे।
देशव्यापी प्रदर्शन, महाभियोग और सुप्रीम कोर्ट की मांग
SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग के भीतर उपजे इस आंतरिक असंतोष ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के प्रमुख दलों ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है।
1. विपक्षी दलों का उग्र प्रदर्शन
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इस्तीफे की मांग: कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), और अन्य विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफे की मांग की है।
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सड़क से संसद तक घेराबंदी: दिल्ली सहित पश्चिम बंगाल, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में विपक्षी कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी ने स्वयं दिल्ली में प्रभावित परिवारों के साथ चुनाव आयोग के बाहर विरोध जताया।
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महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion): विपक्षी दलों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
2. कानूनी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी की मांग
वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल सहित कई प्रमुख कानूनी दिग्गजों ने मांग की है कि:
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सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेना चाहिए।
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पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग्स और आपत्तियों के नोट्स की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
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जिन राज्यों में इस अवधि के दौरान मतदाता सूचियों में मनमाने बदलाव किए गए हैं, वहां के संशोधनों की समीक्षा की जानी चाहिए।
वर्तमान स्थिति और आगे का रास्ता
विवाद के तूल पकड़ने के बाद निर्वाचन आयोग ने स्थिति को संभालने के लिए कुछ सुधारात्मक कदम उठाए हैं:
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समीक्षा समिति का गठन: आयोग ने IT प्रणालियों और ECINet की चुनाव नियमों से अनुपालन जांच के लिए एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में IIT/IIIT विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक समीक्षा समिति बनाई है।
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पारदर्शिता का आश्वासन: आयोग ने कहा है कि भविष्य की बैठकों के लिए एजेंडा पहले से साझा किया जाएगा और मिनट्स व्यवस्थित रूप से दर्ज किए जाएंगे।
हालांकि, इन आश्वासनों से राजनीतिक तूफान थमता नजर नहीं आ रहा है।
हमारा टाइम्स का दृष्टिकोण:
लोकतंत्र की नींव ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ पर टिकी होती है। जब तक देश की शीर्ष चुनाव संस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठ रहे सवालों का जवाब ठोस सबूतों और पूर्ण पारदर्शिता के साथ नहीं दिया जाता, तब तक आम मतदाताओं का विश्वास बहाल करना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस विवाद में हस्तक्षेप करता है या संसद में इस पर क्या रुख अपनाया जाता है।
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