Panchayat Web Series Review

Panchayat Web Series Review, ऐमज़ॉन की नई सिरीज़ है "पंचायत" जिसे TVF वालों ने बनाया है. जिसमें सामान्य से लोग है और एक खूबसूरत कहानी है.

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Panchayat Web Series Review

“जब ठोकर लगती है तो दर्द होता है, तभी इंसान कुछ सीख पाता है”

‘पंचायत” यानी पंचों की सभा. पंचायत का अस्तित्व वैदिक काल से ही था छोटे-2 कस्बों व गाँवो के लोग अपनी समस्या को आपस में सुलझा लेते थे सब के मत के हिसाब से समस्या का समाधान निकाला जाता था. फिर धीरे-2 ग्रामों के प्रमुख बनने लगे जो पंचायत के प्रमुख कहलाये. वहीं जब ब्रिटिशकाल आया तो उन्होंने इस वयवस्था को खत्म करना चाहा लेकिन इस परंपरा को भारत के लोगो ने तब भी बनाये रखा था. इसके बाद गांधी जी ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी पंचायती व्यस्था पर जौर दिया और आज़ादी के बाद महात्मा गांधी ने देश की आजादी के बाद उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात रखी थी ताकि इस राजनीति में हर एक की भागीदारी हो. हर छोटे से छोटे लेवल तक हर व्यक्ति की बात सुनी जाए.. उनकी ये कल्पना थी की हर गांव पूर्ण प्रजातंत्र होगा. क्या उनकी ये कल्पना सही ढंग में हो पाई.??

बाबा साहेब अंबेडकर जी ने पंचायती राज के कानून तो बना दिये पर गांधीजी की कल्पना के अनुसार ग्राम पंचायतों को स्वावलंबी बनाने की खातिर कुछ नहीं किया गया। गांधी जी चाहते थे कि सत्ता में हर किसी की भागेदारी हो और हर एक गांव के लोगों की हुकूमत या पंचायत का राज होगा.

लेकिन आज़ादी के 70 वर्षों से ज्यादा होने के बाद भी आज ये पंचायते महज़ केवल एक चुनाव बनकर रह गई हैं. ग्रामसभाओं के पास पहुंच रही विभिन्न योजनाओं की धनराशि का गलत उपयोग हो रहा है और जो सुविधाएं गाँव के लोगो को मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है. इन्हीं सब मुद्दों पर थोड़ा-बहुत कटाक्ष करती और हमें संघर्षो के बीच जीवन जीने की एक उम्मीद की सीख देती ऐमज़ॉन की नई सिरीज़ है “पंचायत” जिसे TVF वालों ने बनाया है.

अक्सर होता क्या है जब भी ऐसी कोई फ़िल्म या सीरीज आती है तो इसमें नेता और प्रधान जैसे लोग बड़े ही खलनायक के रुप में होते है लेकिन इसमें ऐसे कुछ नहीं है. पूरी सीरीज़ एक समान्य से गाँव की है जिसमें सामान्य से लोग है और एक खूबसूरत कहानी है.

वो कोटा सीरीज वाले जीतू भैया यानी जितेंद्र कुमार लीड रोल में है, जो इस सीरीज में बनें है अभिषेक त्रिपाठी जो ग्रेजुएट है और कही भी नौकरी ना लगने के कारण एक नापंसद नौकरी करते है. उनकी नौकरी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के फुलेरा ग्राम पंचायत में सचिव के तौर पर लगती है महज 20 हजार तनख्वाह में. इस गाँव में अभिषेक का पाला प्रधान पति ब्रृजभूषण दूबे, ग्राम प्रधान मंजू देवी और सहायक विकास से पड़ता है. इन सबीके बीच कैसे एक नौजवान अभिषेक की ज़िंदगी इस छोटी सी नौकरी में पिसती है ये दर्शया गया है. अभिषेक एक आम युवा की तरह है जसीके अपने कुछ सपने होते है और वह साथ-2 में CAT की पढ़ाई कर रहा होता है ताकि वह MBA करे और एक- डेढ लाख की नौकरी करें.. लेकिन इस गांव में अपनी इस नौकरी के साथ ये सब करना उसके लिए आसान नहीं होता है.

अभिषेक की जिंदगी के साथ-2 गांव की सभी समस्याओं को भी दर्शया गया है, जिसमें बिजली, दहेज़, आत्मसम्मान के नाम पर लड़ाई, महिलाओं का हक और गरीबी जिसे एक समनाये तरीके से दिखाने की कोशिश की गई है जिसपर और बारीकी से काम किया जा सकता था लेकिन ये सभी मुद्दे ज्यादा कॉमेडी वाले होकर दब जाते हैं. बाकी आप सीरीज देख कर अंदाज़ा लगा सकते हैं.

वहीं TVF वालों की एक खास बात ये होती है कि ये छोटे से छोटे किरदार भी बेहतरीन रखते है जिनके भले ही चार डायलॉग हो लेकिन वो छोटे से सीन में भी जान डाल देते हैं.. ये छोटे-2 किरदार पूरे सीरीज में देखने को मिलते हैं, जो मज़ा बंधे रखते है.

कुल मिलाके बात ये है कि इस लोकडाऊन मे कुछ ढूंढ रहै है दखने के लिए तो ये एक अच्छा विकल्प है तो जरूर देखें. और देखने के बाद ये सोचना की क्या आपकी ज़िन्दगी में जो कुछ है उसमें खुश रहकर आगे बढ़ना चाहते है या अधिक के चक्कर में मौजूदा वक्त को खराब करना चाहते है.

Ankur Maurya

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